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विघ्न से विजय तक : भक्ति, बल और धर्म की सनातन यात्रा
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विघ्न से विजय तक : भक्ति, बल और धर्म की सनातन यात्रा

यह दृश्य मात्र तसवीरें नहीं हैं, बल्कि सनातन चेतना के जीवित अध्याय हैं। यहाँ गणपति हैं—बुद्धि, आरंभ और समाधान के प्रतीक; जिनकी शांति में भी सृष्टि की गति छिपी है। उनके चरणों में समर्पण है, और उनके आशीर्वाद में जीवन की सरलता। यहाँ महादेव हैं—रौद्र और करुणा का अद्भुत संतुलन। अग्नि में नृत्य करता उनका स्वरूप बताता है कि संहार भी सृजन की ही भाषा है। अधर्म जब सीमा लांघता है, तब शिव तांडव बनते हैं—नाश के लिए नहीं, न्याय के लिए। हनुमान यहाँ केवल शक्ति नहीं, भक्ति का चरम स्वरूप हैं। उनका झुका हुआ मस्तक बताता है कि सच्ची ताकत विनम्रता से जन्म लेती है। वे राम के चरणों में हैं, क्योंकि जहाँ मर्यादा है, वहीं मुक्ति है। राम और हनुमान का आलिंगन उस संबंध का प्रतीक है जहाँ ईश्वर और भक्त के बीच कोई दूरी नहीं रहती—वहाँ केवल प्रेम, विश्वास और कर्तव्य होता है। और अंत में, रथ पर सवार कृष्ण—धर्म के सारथी। कुरुक्षेत्र की धूल में उड़ता यह दृश्य बताता है कि धर्म कभी निष्क्रिय नहीं होता। जब संशय गहरा हो, तब गीता का स्वर उठता है—“कर्म करो, फल मुझे अर्पित करो।” इन सभी रूपों में एक ही संदेश गूँजता है— भक्ति से बुद्धि, बुद्धि से बल, और बल से धर्म की रक्षा। यही सनातन का सत्य है, यही जीवन का मार्ग।

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